मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 27 January 2013

गणतंत्र दिवस और समारोह

                      देश में अपने संविधान को अपनाए जाने के दिन पर जिस तरह से गणतंत्र दिवस पर आज़ादी के बाद से ही अपनी भौगोलिक विविधता, सांस्कृतिक विरासत, विकास के अर्जित आयामों के साथ उत्कृष्ट सैन्य शक्ति का राजपथ पर प्रदर्शन किया जाता है अब कुछ लोग इसके औचित्य पर भी प्रश्न लगाने लगे हैं जिसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि देश में यह एक परंपरा के रूप में मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पर्व है जिसके लिए किसी को भी अपनी राय देने का हक़ तो हमारे देश का संविधान देता है तब भी वे इसको मनाए जाने पर भी सवालिया निशान लगाने से नहीं चूकते हैं. क्या भारत जैसे किसी देश को इस बात पर भी विचार करने की ज़रुरत भी है कि वह अपने गणतंत्र दिवस को समारोह पूर्वक मनाए या उसे ऐसे ही रस्मी तौर पर मनाकर छुट्टी कर ले क्योंकि जिस तरह से नयी सोच के लोग अब देश में बढ़ते ही जा रहे हैं उनकी नज़रों में इस तरह के भव्य आयोजन कहीं न कहीं से धन और समय की बर्बादी हैं पर इससे देश के सम्मान और विविधता को जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्थान मिलता है और विदेशों में बसे लोग देश के बारे में जान पाते हैं उसके बारे में कोई विचार क्यों नहीं करना चाहता है ?
                        जब से देश आज़ाद हुआ है तब से हमने बहुत सारे मोर्चों पर प्रगति के नए आयाम भी गढ़े हैं और उन आयामों को पाने की ललक के कारण ही आज भारत के साथ व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों की प्रगाढ़ता पर विश्व के अधिकतर देश ध्यान देने लगे हैं पर साथ ही हमारे देश के राजनैतिक तंत्र से जो भूल हुई है या जिस तरह से देश के सामने आने वाली नयी नयी समस्याओं की अनदेखी की गयी है उसका ही यह परिणाम है कि आज उन कारणों से ही देश की अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर किरकिरी भी होती रहती है पर क्या इस तरह के कारणों से हम अपने देश के लिए मनाए जाने वाले इस दिवस को समारोह पूर्वक मनाए जाने पर पुनर्विचार करने की ज़रुरत महसूस करते हैं ? देश में जो कुछ भी आज हो रहा है उसके लिए जहाँ के तरफ़ नीतियां निर्धारित करने वाले ज़िम्मेदार हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ हम भी आम नागरिकों के रूप में उतने ही विफल साबित हुए हैं क्योंकि हमेशा अपने बारे में ही सोचने की मानसिकता ने हमारी राजनैतिक व्यवस्था में इतनी कमी पैदा कर दी है कि आज कोई भी दल इन बुराइयों से बचा नहीं रह पाया है ऐसे में यह हमारी भारत के आम नागरिक की अधिक नाकामी लगती है क्योंकि हम ही अपने लिए अच्छे और सार्थक नेतृत्व देने वाले नेताओं को नहीं चुन पाए ?
             जब विभिन्न धर्मों के प्रवर्तकों और विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिनों पर सरकार छुट्टी रखकर उनके नाम पर विभिन्न तरह के आयोजन करने से नहीं चूकती है तो देश के संविधान को लागू करके एक पूर्ण गणतंत्र होने की इस तिथि को समारोह पूर्वक मनाए जाने में क्या कमी है और इसे किस तरह से ग़लत ठहराया जा सकता है जबकि हम खुद ही रोज़ नयी नयी गलतियाँ करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं ? सबसे पहले हमें अपने राष्ट्रीय पर्वों के बारे में इस तरह से सोचना बंद करना होगा क्योंकि जब तक हम अपने देश के इन चुनिन्दा अवसरों के प्रति सम्मान की दृष्टि विकसित नहीं कर पायेंगें तब तक कुछ भी ठीक होने वाला नहीं है ? देश को जब कुछ देने की बात आती है तो हम अपने गिरेबान में झाँकने के स्थान पर दूसरों पर उँगलियाँ साधते दिखाई देते हैं जिससे भी हमारा दोहरा चरित्र दिखाई देता है जब हम जनता के रूप में दोहरे चरित्र को जीना चालाकी पूर्वक सीख चुके हैं तो हमारे द्वारा चुने जाने वाले इन नेताओं से हम उत्तम चरित्र वाला होने की आशा आख़िर कैसे कर सकते हैं ? अब समय आ गया है कि हम अपने कहने और करने में व्याप्त इस अंतर को ख़त्म करने की दिशा में प्रयास करें क्योंकि लोकतंत्र में पुरानी कहावत "यथा राजा तथा प्रजा" काम नहीं करती बल्कि अब जागरूक प्रजा के रूप में हम अच्छे राजाओं का चुनाव ही नहीं कर पाते हैं ?  
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