मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 22 November 2013

दंगों की राजनीति अब कोर्ट में

                                          मुज़फ्फरनगर दंगों के मामलों की जांच की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से यूपी सरकार को लताड़ा है और उससे पूछा है कि क्या इन दंगों में केवल मुस्लिम ही दंगा पीड़ित हैं और हिदुओं पर इसका कोई असर नहीं हुआ है ? इस टिप्पणी के बाद ही जिस तरह से यूपी सरकार के वकील ने इस गलती को स्वीकार किया और अक्टूबर में जारी किये गए नोटिफिकेशन को रद्द कर उसे फिर से जारी करने की बात कही है उससे यूपी सरकार के काम करने के तरीके के बारे में लोगों को भाजपा की बातों पर और भी भरोसा होने लगेगा. इन दंगों में यूपी सरकार की भूमिका शुरू से ही बहुत विवादित रही है और जिस तरह से सरकार ने दंगों को रोकने के स्थान पर पुलिस और प्रशासन का दुरूपयोग किया और अपने हिसाब से ही कार्यवाही करवाने के लिए उन पर दबाव डाला उसके बाद यह पूरा प्रकरण कोर्ट तक जाना ही था. अब कोर्ट में इस तरह से लताड़ पड़ने पर अपने चुनावी अभियान में भाजपा इसका लाभ उठाने की ठीक उसी तरह से कोशिश करेगी जैसी सपा ने आरोपियों को पकड़ने और मुक़दमे दर्ज़ करने में की थी.
                                     अपने वोटों को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न दलों के नेता जिस तरह से मामलों को हद दर्ज़े तक बिगाड़ने के बाद जिस तरह से अपनी सियासी रोटियां सेंकने का काम करने लगते हैं उससे उन पर तो कोई असर नहीं पड़ता है पर आम लोगों के लिए जीना और भी मुश्किल ही हो जाया करता है क्योंकि ये खुद तो उच्च सुरक्षा में रहा करते हैं और समय पड़ने पर आम लोगों के बीच पनपने वाले छोटे से अविश्वास को बड़े स्तर पर बढ़ा चढ़ा कर पेश करते हैं और किसी भी स्थिति में प्रशासन और पुलिस को निष्पक्ष होकर काम करने ही नहीं देते हैं ? जिसका सीधा असर पूरी व्यवस्था पर पड़ने के साथ ही पूरे देश की राजनीति पर भी पड़ा करता है. किसी भी तरह के दंगों को कभी भी किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि इससे जो भी सामजिक ताना बाना छिन्न भिन्न होता है उसको फिर से बहुत सारे प्रयास करने के बाद भी नहीं ठीक किया जा सकता है और किसी भी परिस्थिति में जब देश में इस तरह से वैमनस्यता बढ़ती है तो उससे देश के विकास की गति भी बाधित होती है.
                                    देश के कानून में एक और संशोधन की आवश्यकता है जिसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित हो किसी भी तरह के सामाजिक, राजनैतिक, भाषायी क्षेत्रीय या धार्मिक आधार पर होने वाले किसी भी संघर्ष की जांच राज्य पुलिस से ले ली जाये और उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में की जाये जिससे दंगों के बाद में उसके प्रभावों का लाभ उठाने की किसी भी मानसिकता का खुलासा कोर्ट के माध्यम से जनता के सामने होता रहे और जांचों का मसला हाथ से निकल जाने पर कोई दल उसका राजनैतिक लाभ भी नहीं उठा सकेगा ? इसमें जांच अधिकारी बिलकुल उसी तर्ज़ पर कोर्ट द्वारा नियुक्त किये जाएँ जिस तरह से चुनाव के समय अधिकारी पूरी तरह से चुनाव आयोग के आधीन हो जाते हैं इससे एक तरफ अनावश्यक विवाद जन्म नहीं लेंगें और केंद्र राज्य सम्बन्धों को भी सामान्य रखा जा सकेगा. कोर्ट के दखल के बाद जिस तरह से नेताओं को चुप ही रहना पड़ता है उससे भी समाज में जल्दी ही समरसता लाने में मदद भी मिलेगी पर हर बात के साथ दंगों का भी राजनैतिक लाभ उठाने वाले नेता आखिर इस तरह की व्यवस्था के लिए क्या कभी राज़ी भी होंगें ?       
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