मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 13 January 2014

कोयला ब्लाक आवंटन और सुप्रीम कोर्ट

                                                   कोयला ब्लाक आवंटन में बड़े पैमाने पर जांच कर रही सीबीआई को जिस तरह से ६० आवंटनों में कोई अनियमितता नहीं मिली है और एजेंसी इस आशय की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने जा रही है उससे यह आशा की जा सकती है कि इस मामले में कोर्ट जाँच के आधार पर ही कोई फैसला कर सकता है क्योंकि यदि एक तरफ़ से २ जी मामले की तरह पूरे आवंटन को ही निरस्त किया गया तो उससे उन कम्पनियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है जिन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ देश के कानून को सम्मान देते हुए पूरी प्रक्रिया को पूरा किया था. २ जी मामले में कोर्ट ने सभी स्पेक्ट्रम आवंटन को एक सिरे से ही रद्द कर दिया था जिसके बाद मोबाइल क्षेत्र से छोटे और प्रतिस्पर्धी प्रतियोगियों के हट जाने के बाद वहाँ पर कुछ कम्पनियों का ही वर्चस्व दिखायी देने लगा है और मोबाइल सेवा पहले से मंहगी भी हुई है. कोर्ट किसी भी तरह की अनियमितता को किसी भी स्तर पर कोई छूट नहीं दे सकता है पर साथ ही जिन लोगों की तरफ से कोयला मामले में कोई गलती नहीं की गयी है उन्हें भी कुछ अन्य लोगों की सजा भी नहीं मिलनी चाहिए.
                                                   जिस तरह से १९९३ से २००४ और फिर २००६ से २००९ के समय में दिए गए सभी १९५ आवंटनों की जांच कोर्ट की निगरानी में सीबीआई द्वारा की जा रही है उस स्थिति में कोर्ट का निर्णय चाहे कुछ भी हो पर २ जी स्पेक्ट्रम मामले में कोर्ट की सख्ती को देखते हुए यह आशंका जतायी जा रही है कि कहीं इस मामले में भी पूरी आवंटन प्रक्रिया को ही रद्द न कर दिया जाये ? अब सीबीआई ने जब सभी मामलों की जांच के बाद केवल १६ मामलों में ही कुछ न कुछ गड़बड़ियां पायी हैं और उनके अनुसार ही प्राथमिकी भी दर्ज़ करा दी गयी है तो इस स्थिति में सरकार और उद्योग जगत कोर्ट से केवल इन मामलों को ही रद्द किये जाने और बाकियों को छोड़ देने की आशा लगाये बैठे हैं क्योंकि हर नीतिगत मामले में इस तरह से उँगलियाँ उठाये जाने के कारण ही देश पिछले कुछ वर्षों से गतिरोध का सामना करने में लगा हुआ है और बड़े नीतिगत फैसले लेने में सरकार और अफसरों के पसीने छूट रहे हैं. हर प्रक्रिया में कुछ न कुछ खामियां समय बीत जाने के अनुसार सामने आने लगती हैं. स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र होने के नाते इन कमियों को दूर करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए.
                                                  किसी भी बड़े नीतिगत परिवर्तन की निगरानी के लिए केवल सरकार को ही ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि देश के संविधान ने लगभग हर मामले में संसद को संसदीय समितियां बनाने की छूट दी हुई है और उसके अनुसार काम करने पर सभी दलों की जानकारी में यह बड़े परिवर्तन स्वतः ही गुण दोषों के विवेचन के लिए आते ही रहते हैं तो किसी भी बड़े नीतिगत फैसले में अप्रत्यक्ष रूप से विपक्ष क्या पूरी संसद ही शामिल रहा करती है. पहले जिस तरह के विद्वान लोग सदन में हुआ करते थे और जिन प्रतिभाओं की कमी महसूस हुआ करती थी सरकार उन्हें राज्य सभा के माध्यम से आगे लाकर उनके विचारों को सरकारी फैसलों में जोड़ा करती थी पर पिछले कुछ वषों में इन विशेषज्ञों के स्थान पर पार्टियों ने अपने उन नेताओं को ही आगे करने में रूचि दिखानी शुरू कर दी हैं जो लोकसभा के माध्यम से सदन तक नहीं पहुँच पाते हैं तो उस स्थिति में सदन में मेधा की कमी दिखायी देने लगती है. देश के विकास के लिए नीतिगत और व्यवस्थागत पारिवर्तन बहुत आवश्यक हैं पर इस तरह से जल्दबाज़ी में लिए गए फैसलों और हर मामले में भ्रष्टाचार को खोजने से देश के लिए नीतियां बनाना कठिन ही होने वाला है.    
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