मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 22 January 2014

राजनैतिक संक्रमण या ज़िद

                                                        दिल्ली में आप और उसकी सरकार के ३२ घंटे तक धरना देने और फिर उसे नाटकीय तरीके से ख़त्म करने की तरफ जाने से देश के सामने कुछ सवाल एक बार फिर से खड़े हो गए हैं कि जिसमें सबसे पहला यही है कि क्या राजनैतिक शक्ति मिल जाने या सत्ता की सीढ़ियां चढ़ जाने के बाद व्यक्ति की सोच में अंतर आ जाता है या फिर उसे जिस समझदारी से काम करने की तरफ बढ़ना चहिये वह अचानक से कहीं दूर गायब सी हो जाती है ? दूसरे यह कि क्या केजरीवाल या देश के अंदर रहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इस तरह से गणतंत्र दिवस की अवज्ञा करने तक की बात क्या राजनीति या देश को सुधारने की तरफ एक कदम कही जा सकती है या फिर केवल गम्भीर मुद्दों पर केवल खानापूरी करते हुए सरकार को घसीटने की कवायद ही सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण हो जाती है ? राजनीति में सदैव ही इस बात की गुंजाईश बची रहेगी कि सरकार चलाने और जनता के बीच तक योजनाएं पहुँचाने के सबसे बेहतर रास्ते कौन से हैं पर इस लड़ाई में देश को बीच में लाने का क्या मतलब बनता है ?
                                                        जिस तरह से वर्तमान राजनैतिक ढांचे को नेताओं द्वारा अपने अनुरूप ढाल लेने के बाद गवर्नेंस के तरीके पर आम जनता में बहुत अधिक क्षोभ दिखायी देने लगा था और समय रहते दिल्ली की पढ़ी लिखी जनता के सामने आम आदमी पार्टी ने खुद को एक अलग विकल्प के रूप में पेश किया जिसका उसे भरपूर लाभ भी मिला पर उस लाभ का उपयोग उसे जिस तरह से उठाना चाहिए था अपनी बचकानी और आर्थिक मोर्चे पर न टिक पाने वाली असंगत नीतियों के चलते उसने वह बढ़त कहीं न कहीं से खुद ही खो दी है. दिल्ली पुलिस के जवानों के निलम्बन की मांग करते करते उनके ट्रान्सफर फिर ५ की जगह केवल २ के ट्रान्सफर को जनता की जीत बताते हुए आंदोलन को ख़त्म करना अरविन्द और उनकी टीम की अदूरदर्शिता को ही दिखाता है. जब मामले की जांच के आदेश उप राज्यपाल द्वारा दे दिए गए थे तो उस जांच की रिपोर्ट की प्रतीक्षा किये बिना इस तरह के आंदोलन और अराजकता का क्या मतलब हो सकता है दिल्ली की जनता ने अपनी बेरुखी से यह सब आम से ख़ास बने दल को अपनी भाषा में समझा ही दिया है. राजनीति में आने के बाद जिस तरह से नौसिखिये विधायक और आप के नेता बर्ताव कर रहे हैं उससे यही लगता है कि वे आज भी सड़कों पर ही संघर्षरत हैं.
                                                 देश के कुछ सोशल मीडिया में सक्रिय तत्वों के अति उत्साह को यदि छोड़ दिया जाये तो देश की आम जनता १९४७ से आज तक चल रही नीतियों और परम्पराओं पर इस तरह हमला बर्दाश्त नहीं करती है फिर अरविन्द ने दिल्ली की जनता के पिछले समर्थन को अपने लिए जीने मरने वाला समझ कर जिस तरह से दिल्ली की जनता का आह्वाहन किया कि वो भी इस आंदोलन में शामिल हो जाये फिर भी पडोसी राज्यों से लायी गयी केवल दो तीन हज़ार की भीड़ ने भी अरविन्द को दिल्ली का असली मूड समझा ही दिया है तभी १० दिनों तक संघर्ष की बातें करने वाले वो और उनकी पार्टी को एक घंटे की बैठक में ही सब समझ में आ गया और उप राज्यपाल नजीब जंग की अपील ने उनका इतना ह्रदय परिवर्तन कर दिया कि वे धरना समाप्त करने पर राज़ी हो गए. देश को चलाने के लिए राजनीति और कूटनीति सभी का समावेश किया जाता है और चाणक्य के इस देश में राजनीति में कोई अछूत नहीं होता का वाकया सदैव ही अपने को सिद्ध करता भी रहा है. जिस तरह से धरने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने स्तर पर याचिका को स्वीकार कर लिया था वह अपने आप में इन आम आदमियों के लिए बड़ा झटका भी था इसलिए ही सभी ने बीच का रास्ता निकालते हुए देश को एक बार फिर से बीच रास्ते पर ही छोड़ दिया है.        
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