मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 1 February 2014

पेट्रोलियम क्षेत्र के सुधार गए तेल लेने ?

                                              लोक लुभावनी राजनीति के चक्कर में किस तरह से मज़बूत आर्थिक फैसलों को पलटा जाता है इसका ताज़ा उदाहरण सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडरों की संख्या बढ़ाने और उसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी पूर्व में लिए गए फैसलों को पलटने में देखा जा सकता है. यह सही है कि देश में पेट्रोलियम उत्पाद सदैव से ही राजनीति के केंद्र में रहे हैं और उनको इससे बाहर निकालने के जो भी प्रयास शुरू किये गए थे उनका सही असर भी बाज़ार पर दिखायी दे रहा था पर जिस तरह से अन्य राजनैतिक दल इसे मुद्दा बनाने में लगे थे तो राहुल के माध्यम से कॉंग्रेस ने भी इसे पलटने की पूरी कोशिश ही की है. पेट्रोलियम उत्पादों के लिए देश में आज़ादी के बाद से ही भरपूर मात्रा में राजनीति की जाती रहती है क्योंकि यह मुद्दा जनता के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है और इस पर जमकर राजनीति भी हो सकती है जिससे किसी सरकार के लिए इस मुद्दे को अनदेखा कर पाना आसान नहीं होता है तो इस दौड़ में कॉंग्रेस पीछे कैसे रहती भले ही उसने पिछले दस वर्षों में कितने भी सुधारों की तरफ देश को बढ़ाया हो ?
                            सीमित संख्या में सिलेंडर देने और चरण बद्ध तरीके से डीज़ल के दामों में बढ़ोत्तरी करने से जहाँ देश ने एक बड़े सुधार की तरफ अनचाहे में ही बढ़ना शुरू किया था अब वह फिर से तेल और गैस के खेल में उलझता सा नज़र आ रहा है क्योंकि आम चुनावों के बाद चाहे किसी भी दल/ गठबंधन की सरकार बने उसके लिए इस मसले की अनदेखी आसान नहीं रहने वाली है जो कि देश में पेट्रोलियम सुधारों के लिए बहुत बड़ा धक्का जैसा ही है. सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों में भी भ्रष्टाचार है पर वे जिस तरह से एक नियम के तहत ही देश की ज़रूरतों को सरकारी सब्सिडी के माध्यम से पूरा करने में लगी हुई हैं वह भी अपने आप में पूरी दुनिया में अकेली मिसाल ही होगी ? जनता के पैसे को इस तरह से जनता पर गलत तरीके से लुटाने के बारे में कभी कोई सरकार क्यों नहीं सोच पाती है जबकि सब जानते हैं कि इस तरह से दी गयी सब्सिडी से कालाबाज़ारी को मौका मिलता है और सरकार को राजस्व का नुकसान ही हुआ करता है फिर भी देश और नेता इस बारे में सोचना ही नहीं चाहते है ?
                            अब यदि हमें केवल नारों और सम्मेलनों से आगे जाकर वास्तव में अपने को विश्व में एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करना है तो हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी और हर जन सामान्य को देश के इस बड़े सपने को पूरा करने के लिए कुछ बलिदान देने की ज़रुरत पड़ने वाली है. हम दुनिया के बड़े आर्थिक खिलाड़ी तो बनना चाहते हैं पर अपनी कमज़ोर नस सदैव ही दूसरों के हाथों में रखकर आखिर हम कैसे शक्तिशाली हो सकते हैं इसका जवाब किसी भी राजनेता या दल के पास नहीं है. आज हमें अपनी ऊर्जा निर्भरता की दिशा को बदलना होगा और जिन राज्यों में सौर और पवन ऊर्जा का प्रचुर दोहन सम्भव है वहाँ पर इसके लिए योजनाएं बनायीं जानी चाहिए और भारतीय ऊर्जा आवश्यकतों के लिए एक दीर्घकालीन आर्थिक नीति बनाये जाने की तरफ भी हमें जाना ही होगा जिससे किसी भी सरकार के पास यह अधिकार न रहे कि वो इस तरह से लोकलुभावन नीतियों के दुष्चक्र में देश को फंसाती रहे ? देश को अब यदि आगे बढ़ना है तो आज देश की सबसे बड़ी दोनों पार्टियों को देश हित में मज़बूत आर्थिक फैसलों पर सहमति दिखने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक एक सोच नहीं होगी तब तक कोई हमारे से आगे आसानी से निकल जायेगा और हम अपनी इस घटिया नीति में तेल में ही उलझते रहेंगे.   
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