मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 2 February 2014

हरीश रावत होने का मतलब

                                            उत्तराखंड के राज्य बनने के पहले से ही उसको अलग राज्य के रूप में मांगने वाले ज़मीनी नेताओं में शामिल रहे हरीश रावत के उत्तराखंड के सीएम बनने से जहाँ निराशा में डूबी कॉंग्रेस को एक नया जोश मिला है वहीं राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से पहली बार कोई विशुद्ध पहाड़ी राजनीति करने वाला नेता राज्य का नेतृत्व भी संभल रहा है. हरीश जहाँ अपने दम पर उभरे हुए नेताओं में की कतार में से हैं वहीं उनके पास दिल्ली में कोई बहुत मज़बूत आधार नहीं है पर लम्बे इंतज़ार के बाद जिस तरह से उन्हें राज्य की कमान मिली है उससे राज्य का वास्तव में कुछ भला भी हो सकता है क्योंकि अभी तक जितने भी सीएम वहाँ पर हुए हैं सभी इतने ऊंचे स्तर के नेता थे कि उनका जनता से सीधे कोई संपर्क ही नहीं था जबकि अपनेपन को बहुत ज्यादा महत्व देने वाले पहाड़ी जन मानस के लिए सदैव ही यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण मसला है. रावत की जिस सबसे बड़ी राजनैतिक सफलता ने उन्हें कॉंग्रेस में जगह दिलवायी वह भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल रहे मुरली मनोहर जोशी को १९८० में लोकसभा चुनावों में हराना था जिसके बाद उन्होंने सफलता के नए आयाम भी गढ़े जबकि यह वह समय था था जब कॉंग्रेस इंदिरा गांधी और यूपी कॉंग्रेस नारायण दत्त तिवारी के बिना चल नहीं पाती थी.
                                          अल्मोड़ा से आने वाले हरीश रावत ने जिस संघर्ष के साथ अपने राजनैतिक कैरियर को आगे बढ़ाया और पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह से उन्होंने अपनी परंपरागत सीट छोड़कर सपा के कब्ज़े से हरिद्वार सीट को छीना वह उनकी कार्यशैली और लोकप्रियता को ही बयान करती है. केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी उनके बारे में यह मशहूर है कि वे आज भी अपने क्षेत्र की जनता के लिए पटवारी तक को फ़ोन करने में नहीं चूकते हैं और राजनीति में जिस नेता के पास वोटर्स के भरोसे की यह थाती होती है यदि उनको समय मिल जाये तो वे वास्तव में ही उन परिवर्तनों को कर पाने में सक्षम होते हैं जिनकी उत्तराखंड जैसे राज्य को आवश्यकता होती है. हरीश के काम करने का तरीका सभी जानते हैं इसलिए अब उत्तराखंड में अधिकारियों और नेताओं के लिए अपनी कार्यशैली में परिवर्तन करना बहुत आवश्यक हो जायेगा साथ ही अब कॉंग्रेस आलाकमान को भी राज्य में पार्टी को यह कड़ा संदेश देना ही होगा कि सभी मिलकर राज्य सरकार के साथ काम करे क्योंकि अब गुटबाज़ी से ग्रस्त कॉंग्रेस को सम्भालना केंद्रीय नेतृत्व की भी ज़िम्मेदारी है.
                                         हरीश रावत के पास अब वह समय आ गया है कि वे भी कॉंग्रेस के सभी गुटों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर किसी से भी विद्वेष न रखें और आने वाले समय के लिए राज्य की जनता के उन सपनों को पूरा करने के लिए प्रयासरत हो जाएँ जिनकी राज्य की जनता ने अपेक्षा की है. सबसे पहले तो उन्हें राज्य की राजधानी को गैरसेण ले जाने के लिए एक समय सीमा तय करनी होगी जिससे उन अधिकारियों और नेताओं पर अंकुश लगाया जा सके जो केवल देहरादून में अपने स्तर से राज्य को चलाना चाहते हैं. दूसरी सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने चार धाम यात्रा के लिए न्यूनतम आवश्यक सेवाएं देने की होनी चाहिए क्योंकि पिछले वर्ष की जल प्रलय ने पूरे राज्य में ही सडकों के पूरे संजाल को नष्ट कर दिया है और अप्रैल के माह में जब लोकसभा चुनाव की चुनौतियाँ सामने होंगीं तभी उन्हें इस पवित्र यात्रा के लिए भी अपना पूरा दम लगाना पड़ेगा. राज्य के विकास और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव उनके लिए अगली चुनौतियाँ साबित होने वाले हैं पर साफ़ मंशा से काम करने वाले हरीश रावत को यदि काम करने का अवसर पार्टी की तरफ से मिला तो उसका असर बहुत जल्दी ही राज्य की जनता और पार्टी पर दिखायी भी देगा. 
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