मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 31 January 2014

बेहतर प्रशासन बनाम न्यूनतम तैनाती

                                               लगता है कि प्रशासनिक कार्यों में सरकारों की प्राथमिकताएं और क्रियान्वयन में बड़ा अंतर होने के बाद जिस तरह से विशुद्ध प्रशासनिक मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन किया जा रहा है वह देश में आज के परिदृश्य को ही दिखता है क्योंकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ३१ अक्टूबर १३ के एक निर्देश के अनुपालन में अब यह आदेश जारी कर दिए हैं कि किसी भी राज्य सरकार के लिए आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों को कम से कम दो वर्षों की तैनाती देनी ही होगी और विशेष परिस्थितियों में यदि किसी अधिकारी को हटाने की आवश्यकता पड़ती है तो उस पर केवल राज्य सरकार की मनमर्ज़ी नहीं चलेगी बल्कि राज्य में गठित सिविल सर्विसेज़ बोर्ड द्वारा ही इस पर निर्णय लेने के बाद कोई कदम उठाया जा सकेगा. केंद्र सरकार ने जिस तरह से राज्यों में सामान्य प्रशासन से लेकर अन्य कार्यों को सँभालने वाले इन महत्वपूर्ण अधिकारियों को इस तरह से काम करने का एक अच्छा माहौल देने का प्रयास किया है वह सही दिशा में एक अच्छा प्रयास है भले ही वह मजबूरी का कदम ही क्यों न हो ?
                                             वैसे तो आज़ादी के बाद से ही हर सरकार ने भले ही वह केंद्र में हो या किसी राज्य में उनका प्रयास सदैव ही अपने मन पसंद अधिकारियों के साथ सरकार चलाने का ही ही रहा करता है और प्रथम दृष्टया इसमें कोई दोष भी नहीं दिखायी देता है पर जिस तरह से आज़ादी के तीन दशक बाद इन अधिकारियों ने राजनैतिक दलों में अपने आकाओं की खोज की और नेताओं ने अपने पिट्ठू अधिकारियों की तो उसके बाद से बेहतर संसाधन हो जाने के बाद भी आज प्रशासनिक दक्षता में बड़ी गिरावट देखी जा रही है जिस कारण से भी पूरे देश में काम करने के माहौल पर बुरा असर पड़ा है. इस पूरी कवायद में जहाँ काम करने वाले ईमानदार अधिकारियों का असीमित बार तबादला किया जाने लगा वहीं उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती देने का क्रम भी बिलकुल बंद ही हो गया साथ ही चमचे अधिकारियों और नेताओं के गठजोड़ से आज प्रशासन और पुलिस की क्या हालत हो गयी है यह किसी से भी छिपा नहीं है क्योंकि ये आज सबसे अकुशल माने जाने लगे हैं.
                                           इस कदम से अब कम से कम सरकार को भी सावधानी पूर्वक अधिकारियों के तैनाती स्थल पर विचार करना ही होगा और सही दिशा में प्रशासन को गति देनी ही पड़ेगी क्योंकि अभी तक जिस तरह से किसी भी अक्षम से अक्षम अधिाकरी को भी धर्म, जाति या समूह विशेष का होने के कारण जितनी अच्छी तैनाती मिल जाया करती है अब उनकी कुशलता पर भी असर पड़ने वाला है. जब अधिकारी पर यह दबाव आ जायेगा की उसे राज्य या केंद्र की योजनाओं की सफलता के लिए अपनी दक्षता के साथ काम करने की ज़रुरत है और उस पर किसी भी तरह का पहले जैसा राजनैतिक दबाव नहीं रहा है तो वह भी अच्छे से काम करने के बारे में सोचना शुरू कर देगा. जब निश्चित तैनाती के बाद भी ये अधिकारी कुछ नहीं कर पायेंगें तो उन पर ज़िम्मेदारी भी आएगी और सरकारें उनसे स्पष्टीकरण भी मांग सकेंगीं क्योंकि आज यह सब केवल राजनैतिक हितों को साधने के स्तर से आगे नहीं बढ़ पा रहा है. अपनी दक्षता के लिए जाने जाने वाले इन देश के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच भी अब काम करने का माहौल पनपना ही चाहिए क्योंकि राजनेता इन्हें अक्षम करार देकर किसी दूसरी तरह से इनकी लगाम फिर से अपने हाथ में लेने की कोशिश भी कर सकते हैं.        
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