मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 18 March 2014

भारत और रक्षा उपकरण

                                              स्वीडन की एक रिपोर्ट के अनुसार आज के समय भारत पूरी दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार बना हुआ है और इसके चलते आज जहाँ एक तरफ भारत पर अनावश्यक आर्थिक दबाव पड़ रहा है वहीं उसकी रक्षा आवश्यकताओं के लिए भरपूर मात्रा और संख्या में आधुनिक रक्षा उपकरण भी नहीं मिल पा रहे हैं. आज़ादी के बाद से ही भारत ने जिस तरह से अपने वसुधैव कुटुंबकम और शांति के सिद्धांत के साथ रहने का प्रयास किया और अपनी रक्षा आवश्यकताओं पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया था वह भ्रम सबसे पहले चीन के साथ हुई १९६२ और फिर १९६५ की लड़ाई में टूट गया. तब भारतीय नेतृत्व को इस बात का एहसास हुआ कि दुनिया में सर उठाकर जीने के लिए अपनी सामरिक तैयारियों को भी अच्छे स्तर पर बनाकर रखना पड़ेगा जिससे इस तरह की किसी भी परिस्थिति में देश को हथियारों की कमी के कारण इतना बड़ा नुक्सान न उठाना पड़े और उसके बाद से आये परिवर्तन और हथियारों की खरीद में रूस भारत के एक विश्वसनीय सहयोगी बनकर उभरा है जो कि आज भी भरोसे पर खरा उतर रहा है.
                                           इस रिपोर्ट में भारत की रक्षा खरीद के अचानक से बढ़ने के पीछे कारणों को भी ढूँढा गया है. साठ के दशक में चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती का सामना करने के बाद जिस तरह से भारत ने रूस से हर तरह के हथियारों की खरीद को आगे बढ़ाया था तो अब वे उपकरण और हथियार पुराने पड़ चुके हैं और उन्हें अविलम्ब बदलने के बारे में सरकार ने काम करना शुरू किया है जिससे भी देश का रक्षा बजट अचानक से ही बढ़ा हुआ दिखायी देने लगा है. सेना और अर्ध सैनिक बलों की आज की चुनौतियों को देखते हुए आज सरकार के पास लगभग आठ वर्षों में पूरे होने वाले इस प्रयास को लगातार जारी ही रखना पड़ेगा. रिपोर्ट में एक बात और भी ख़ास तौर पर कही गयी है कि रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्म निर्भरता के लिए कड़े कदम उठाने शुरू किये हैं पर अभी उनका कोई ख़ास परिणाम नहीं दिखायी दे रहा है क्योंकि इस तरह के किसी भी प्रयास के नतीज़े बीस वर्षों से पहले नहीं दिखायी दे सकते हैं और यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसे लगातार चलाते रहने के बाद ही यह लक्ष्य पाया जा सकता है.
                                             देश की सुरक्षा पर कोई ठोस निर्णय न करने के लिए मनमोहन सरकार सदैव ही विपक्षियों के निशाने पर रहा करती है पर जिस तरह से यह बात सामने आयी है तो ऐसा कहीं से भी नहीं लगता है कि भारतीय सामरिक तैयारियों को पूरा करने में संप्रग सरकार ने कुछ नहीं किया है ? यदि ऐसा है तो भारत का रक्षा बजट इतना अधिक ऐसे हो रहा है जबकि किसी नए तरह के कोई हथियार अभी नहीं खरीदे गए हैं राजनीति करने के लिए ये बातें सही हो सकती हैं पर जितनी विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में मनमोहन सरकार ने रक्षा बजट का उपयोग इतना बढ़ाया है उसकी भारतीय परिप्रेक्ष्य में बहुत आवश्यकता भी थी. देश के पास जांबाज़ सैनिकों के साथ यदि उचित हथियार भी रहें तो भारत दुनिया के किसी भी देश का सामना बहुत आसानी से कर सकता है. रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एंटोनी द्वारा जो भी प्रयास शुरू किये गए हैं उन्हें अगली सरकार को प्राथमिकता के आधार पर उसकी सामने आने वाली कमियों को दूर करते हुए चलाना चाहिए जिससे भारतीय सामरिक तैयारियों के लिए आवश्यक धन सदैव उपलब्ध होता रहे और किसी भी रक्षा खरीद में आपूर्तिकर्ता के साथ वे अनुबंध अवश्य ही शामिल किये जाएँ जिनके अनुसार किसी भी तरह की वित्तीय अनियमितता मिलने पर पूरे सौदे को रद्द करना भी शामिल हो.         
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1 comment:

  1. इतनी बौद्धिक क्षमता होने के बाद भी हम अपने शस्त्रादि नहीं बना पाये, दुखद है।

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