मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 20 June 2014

हिंदी की अनिवार्यता या स्वीकार्यता ?

                                              केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सोशल मीडिया पर जिस तरह से हिंदी को बढ़ावा देने की अपुष्ट बातें की गयीं और इसे द्रमुक नेता करुणानाधि द्वारा पूरे देश पर हिंदी थोपने के प्रयास के रूप में देखा गया उसका देश की राजनीति में कोई कोई स्थान नहीं होना चाहिए पर हमारे नेताओं की यह कमज़ोरी भी रही है कि वे किसी भी अच्छे प्रयास को इस तरह से करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं जिसे देश में अनावश्यक रूप से बयानबाज़ी शुरू हो जाती है. एनडीए सरकार हिंदी में काम काज को बढ़ावा दे रही है यह अपने आप में अच्छी बात है पर इसके साथ भी अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की कोशिश भी शुरू की जाने चाहिए जिससे देश की सभी भाषाओं को बोलने वालों को यह लगे कि उनकी उपेक्षा नहीं हो रही है. भाषा का मुद्दा दक्षिण भारत के साथ ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी बहुत महत्वपूर्ण रहा करता है जिसको अनावश्यक रूप से मुद्दा बनाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है.
                                               भाषाओं का काम जोड़ने का होना चाहिए न कि तोड़ने का पर अपने को कुछ अलग दिखने का चक्कर में हमारे नेता ऐसी हरकतें सदैव ही किया करते हैं. आज भाषा के बन्धनों को शिक्षा और विकासात्मक गतिविधियों के माध्यम तोड़ने की अधिक आवश्यकता है. यदि गृह मंत्रालय को हिंदी में अपने काम काज को बढ़ावा देना है तो इस बात को आसानी से किया जा सकता है पर जिस तरह से इसका प्रचार किया गया और खुद गृह मंत्रालय के ट्विटर हैंडल पर अंग्रेजी को महत्त्व दिया गया है तो उससे उसकी मंशा का पता चल जाता है. पूर्ववर्ती सरकारें भी हिंदी में काम काज करती ही रही हैं पर उसको कभी भी इस तरह से मुद्दा नहीं बनाया गया पर गृह मंत्रालय की छोटी सी लापरवाही चुनाव हारी हुई द्रमुक को क्या भाषाई आंदोलन करने का एक बड़ा अवसर नहीं दे सकती है ? दशकों बाद देश में भाषा जब कोई मुद्दा नहीं है तो हिंदी के इस तरह के प्रसार से एक नयी समस्या फिर से शुरू हो सकती है जिसमें हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं का नुकसान ही होना है. 
                                              देश के सभी हिस्सों में भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी भाषाओं को पढ़ाये जाने कई समुचित व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में जब पूरा विश्व सूचना और तकनीक के दम पर एक छत के नीचे आने वाला है तो उस स्थिति में आखिर किसी भी भाषा को लेकर इस तरह से कैसे दबाव बनाया जा सकता है ? हिंदी का प्रचार अपने आप ही हो रहा है और सरकार की इसमें कोई बहुत बड़ी भूमिका अभी तक नहीं रही है भारत सरकार और उसके सभी उपक्रमों की पहले से ही सोशल मीडिया और नेट पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रभावी उपस्थिति सदैव ही रही है तो क्या गृह मंत्रालय भी हिंदी को बढ़ावा देने के साथ ही अंग्रेज़ी में अपनी सूचनाएँ देकर कुछ उदारता नहीं दिखा सकता है ? आज भी देश के बहुत सारे राज्यों में महत्वपूर्ण नेता हिंदी नहीं बोल पाते हैं तो क्या इससे उनकी क्षमताएं प्रभावित होती हैं ? अच्छा हो कि एनडीए सरकार सबसे पहले देश के चारों भागों में केवल भाषाई विश्वविद्यालय खोलने के बारे में विचार शुरू करे और जिन लोगों को अपनी मातृभाषा कि अलावा किसी भी दूसरी भाषा को पढ़ने की इच्छा है वो पूरे देश से इनमें आकर शिक्षा ग्रहण कर सकें जिससे भाषाई जड़ता को तोड़ने में सहायता मिल सकती है.
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