मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 31 August 2014

अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण

                                                           देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में व्याप्त संकट से निपटने के बाद एक बार फिर से रफ़्तार पकड़ने की तरफ बढ़ रही है जिससे आने वाले समय में इसके और मज़बूत होने की सम्भावना और भी बलवती हुई है. किसी भी देश के आर्थिक विकास को कुछ महीनों के प्रदर्शन के आधार पर नहीं मापा जा सकता है पर हमारे देश में जिस तरह से टीवी और समाचार माध्यमों द्वारा इस तरह की ख़बरों को कभी बहुत बड़ी नाकामी और कभी बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में मान लिया जाता है और कई कई दिन तक उसको दर्शकों को ज़बरदस्ती दिखाया जाता है उससे देश का किस तरह से भला होने वाला है यह कोई नहीं जानता पर सनसनी फ़ैलाने में माहिर हमारे न्यूज़ चैनल अपने लिए कुछ दर्शक जुटाने में अवश्य ही सफल हो जाते हैं. देश की अर्थव्यवस्था कोई बच्चों का खेल नहीं है और इस बात को वर्तमान सरकार भी समझ रही है तथा उसको सुधारने के लिए जो भी उपाय संभव हैं उन पर पूरे मनोयोग से काम भी किया जा रहा है जिसके और भी सुखद परिणाम आने वाले समय में सामने आने वाले हैं.
                                                          एक व्यापक नीति के तहत जिस तरह से पहले पेट्रोल को बाजार के मूल्य से जोड़ा गया और अब डीज़ल भी लगभग ५० पैसे प्रति माह की बढ़ोत्तरी के साथ लगभग बाज़ार के मूल्य पर ही पहुँच चुका है तो आने वाले समय में इन दो उत्पादों पर दी जाने वाली सब्सिडी भी सरकार के ख़ज़ाने को भरने का काम करने वाली है पर अभी भी केरोसिन और घरेलू गैस के मूल्यों को एक ठोस नीति अपनाकर राजनीति से दूर रहते हुए काफी हद तक सुधारने की गुंजाईश भी है. देश के समाचार पत्र भी जिस तरह से रिज़र्व बैंक के गवर्नर और सरकार के बीच मतभेदों की बात करते हैं उनका भी कोई मतलब नहीं है क्योंकि रिज़र्व बैंक का काम देश की मुद्रा स्फीति और विकास को स्थायी रखने के लिए नीतियों तक ही है और सरकार अपने सामाजिक या राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होती है. बहुत बार रिज़र्व बैंक सरकार की लोकलुभावन नीतियों से सहमत नहीं होता है पर मामला उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण वह कुछ कर भी नहीं सकता है.
                                                       पिछले वर्ष से ही रिज़र्व बैंक और सरकार ने अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षणों की आशा व्यक्त कर दी थी और जनवरी के बाद अब दूसरी तिमाही में भी उसमें सुधार देश की प्रगति और मज़बूती को ही प्रदर्शित करने वाले हैं. पिछली सरकार के समय जिस तरह से यह माना जाने लगा था कि वह अनिर्णय का शिकार रहती है और नीतिगत मुद्दों पर ठहराव दिखाई देता है तो उसे इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए कि देश में आये सूचना के अधिकार कानून के बाद कुछ लोगों द्वारा अनावश्यक रूप से हर सरकारी निर्णय के खिलाफ कोर्ट जाने की जो परिस्थितियां पैदा हुईं उनका इस तरह का असर भी पड़ना ही था. आज भी इस कानून के साथ देश को जीने के तरीके को खोजने की आवश्यकता है. वर्तमान सरकार द्वारा किये जा रहे निर्णयों को भी इसी तरह से अनावश्यक विवादों में उलझाया जा सकता है जिससे जिस गति की सम्भावना व्यक्त की जा रही है उस पर भी कुछ हद तक लगाम लग सकती है. अब देश को आर्थिक मामलों में राजनीति बंद कर विकासपरक बातों की तरफ सोचने और बढ़ने की आवश्यकता है क्योंकि इस तरह के मामले देश के भविष्य पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.           
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