मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 14 July 2015

अब अमिताभ ठाकुर

                                                           सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ विभिन्न कारणों से सामंजस्य न बैठा पाने वाले भारतीय सेवा के अधिकारियों में अब यूपी के आईजी (नागरिक सुरक्षा) अमिताभ ठाकुर का भी नाम जुड़ गया है. इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिस अधिकारी के पास देश की सबसे बड़ी आबादी की नागरिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी हो वह अपनी सुरक्षा के लिये केंद्रीय गृह मंत्रालय के चक्कर काटने को मजबूर है. इस पूरे प्रकरण में अमिताभ के खिलाफ जो बात सत्ता को सबसे अधिक चुभती रही है कि उनकी पत्नी नूतन ठाकुर एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ आरटीआई एक्टिविस्ट भी हैं जिसके चलते कई बार उन्होंने कई ऐसे मामलों का खुलासा भी किया है जिससे अखिलेश सरकार को भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है. इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से दुर्गा शक्ति की तरह अमिताभ ठाकुर से व्यवहार किया जा रहा है वह सीधे तौर पर उनके उत्पीड़न की श्रेणी में ही आता है, आज भी देश में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह राज्यों में होने वाली इस तरह की घटनाओं को रोकने में सफलता पा सके. यह सही है कि कई बार इन अधिकारियों द्वारा भी अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया जाता है और सत्ताधारी दल के अलावा किसी अन्य दल से निकटता होने के चलते भी इस तरह के मामले सामने आया करते हैं.
                            इस मामले में जिस तरह से अमिताभ ठाकुर ने सीधे ही अखिलेश सरकार और मुलायम सिंह से टक्कर लेने की कोशिश की है उसके बाद उनका निलंबन भी हो गया है जिसके चलते अब उनके साथ प्रदेश सरकार पुलिसिया व्यवहार करने से भी नहीं चूकने वाली है और इसका दुष्प्रभाव पूरे सिस्टम पर ही पड़ने वाला है. यह मामला जिस तरह से मीडिया में उछल गया है उसके चलते अब अखिलेश सरकार के बहुत सारे अच्छे कामों पर भी जनता की नज़रें नहीं जाने वाली हैं और साथ ही बसपा / भाजपा इस मुद्दे पर पूरी राजनीति करने से भी नहीं चूकने वाली है. मायावती द्वारा अभी तक स्पष्ट रूप से कोई बयान जारी नहीं किया गया है जिसके चलते भाजपा इस प्रकरण में सपा सरकार की छवि को और गहरा आघाता लगाने की स्थिति में पहुँच चुकी है और इस तरह के प्रकरण लम्बे समय तक खिंचने के बाद सदैव ही सत्ताधारी दल को ही व्यापक नुकसान पहुँचाया करते है. कानूनी रूप से मुलायम सिंह की आवाज़ होने की पुष्टि आवश्यक है और उसके बाद ही कुछ मामला आगे बढ़ पायेगा पर एक बात तो अवश्य ही हैरान करने वाली है कि मुलायम जैसे विशुद्ध राजनैतिक व्यक्ति से इस तरह की गलती आखिर हुई कैसे जिसको लेकर उन्हें विवाद में आसानी से घसीट लिया गया ?
                              इस तरह की निरंतर बढ़ती हुई घटनाओं के बीच अब अखिल भारतीय और राज्य स्तरीय अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए नयी नियमावली की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है क्योंकि देश में राजनैतिक दलों की नैतिकता में जो क्षरण हो रहा है और उसका सीधा असर इन अधिकारियों पर स्पष्ट रूप से पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है तो इस बारे में सोचने की आवश्यकता भी सामने आ गयी है. निश्चित तौर पर कुछ अधिकारियों का दल विशेष की तरफ रुझान भी रहा करता है और इससे बचने के लिए इन सेवाओं से हटने के बाद किसी भी अधिकारी के चुनाव लड़ने या राजनैतिक दल में शामिल होने के बीच में कम से कम तीन वर्षों का अंतर भी रखा जाना चाहिए जिससे राजनैतिक दलों और अधिकारियों को इस तरह से एक दूसरे के हितों को साधने की खुली छूट न मिल सके. कानून और संविधान के अनुसार काम करने वाले अधिकारियों को उचित माहौल मिल सके और उसके लिए वे काम कर सकें यह राजनैतिक प्रतिष्ठानों पर ही निर्भर करता है. कानूनी रूप से किसे राहत मिलेगी और कौन दोषी ठहराया जायेगा यह तो समय ही बताएगा पर सीधे मुलायम सिंह के प्रकरण में शामिल होने की घटना के बाद अब सपा के खिलाफ हल्ला बोलने वाले दलों को सपा पर पूरी तरह से अराजक होने के आरोप लगाने के और भी अवसर मिलने वाले हैं.       
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