मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 4 July 2015

पुस्तकें और राजनीति

                                                      पिछले कुछ वर्षों में सत्ता के बेहद करीब रहने वाले लोगों में जिस तरह पुस्तकें लिखने का चलन बढ़ता ही जा रहा है उससे यही लगता है कि यह सब सच्चाई सामने लाने से अधिक अपनी बातों को देश के सामने लाने की कोशिश ही लगती है. ताज़ा घटनाक्रम में पूर्व रॉ प्रमुख ए एस दुलत ने जिस तरह से अटल सरकार के साथ अपने कार्यकाल में घटने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में लिखा है उनमें से अधिकतर बातें लोगों के सामने पहले से ही हैं और इस पर इतना अधिक हल्ला मचाये जाने की आावश्यकता भी नहीं है. इस बात को केवल इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए कि यह एक अधिकारी के अपने संस्मरण ही हैं जिन्हें उसने अपने ढंग से प्रस्तुत किया है. देश की राजनीति इतने घटिया स्तर तक पहुंची हुई है कि अपने विरोधी दल के बारे में कुछ भी सामने आने पर दूसरा दल नेताओं से माफ़ी और इस्तीफे की मांग करने में जुट जाता है जिसका कोई मतलब नहीं होता है क्योंकि समय बीत जाने के बाद उन बातो की समीक्षा करने से समय वापस नहीं लौट सकता है तथा राजनेताओं की गलतियों की सजा देश भगत चूका होता है.
                                      बहुत सारे मामलों में जिस तरह से समीक्षायें की जाती हैं क्या उनका आज कोई मतलब भी होता है क्योंकि देश की सत्ता ने एक बार जो अवसर खो दिए उन्हें दोबारा से पाना उतना आसान नहीं होता और वे इतिहस में दर्ज़ होकर कुछ लोगों के लिए बड़े सर दर्द ही साबित होते रहते हैं. कारगिल युद्ध और कंधार कांड अटल सरकार के लिए दो बड़ी विफलताएं ही थीं देश उनकी कीमत चुका अदा कर चुका है इसलिए अब उन बातों को लेकर किसी के किसी भी खुलासे या बयान का कोई मतलब नहीं बनता है पर आज भी देश के राजनेता उन बातों को कुरेदने के लिए आगे आते रहते हैं और साथ ही दुसरे नेताओं पर हमले करते रहते हैं उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि देश काल के अनुसार लिए गए बहुत से निर्णय कई बार बहुत कारगर साबित होते हैं और कई बार वे इतने बुरे साबित हो जाते हैं कि कोई उन्हें याद भी नहीं रखना चाहता है. इस परिस्थिति में देश के नेताओं में कुछ अधिक परिपक्वता आनी चाहिए जिससे वे एक दूसरे पर इतने घटिया तरीके से हमले न कर सकें.
                                     आज वाजपई के बयानों को लेकर कोई भी पीएम मोदी से इस्तीफे और माफ़ी की मांग कर सकता है पर क्या इस तरह के मामले मसले को हल करने की तरफ ले जाते हैं ? संघ और भाजपा भी सदैव कश्मीर में पाक की आज़ादी के बाद की गई नियोजित घुसपैठ को लेकर कांग्रेस और नेहरू पर हमलावर रहा करते हैं जिसकी अब कोई आवश्यकता नहीं है. देश में बहुत सारे विवादित काम भी हुए हैं जिनका किसी भी रूप में समर्थन नहीं किया जा सकता है पर क्या आज उन बातों का इस तरह से ज़िक्र करना सही कहा जा सकता है ? भाजपा सदैव ही ऐसे मुद्दों के सामने आने पर कांग्रेस पर हमलावर रहा करती है तो अटल और मोदी के खिलाफ अटल के बयानों को लेकर उसे इन दोनों नेताओं पर हमला करने का अवसर मिला है तो कांग्रेस भी उसे छोड़ना नहीं चाहती है और कंधार कांड के चलते वह भाजपा पर एक बार फिर देश के सम्मान को गिरवी रखने की बातें करने से नहीं चूकने वाली है. अच्छा हो कि देश के बड़े राजनैतिक दल इस तरह की घटिया राजनीति से बाहर आकर भविष्य में ऐसी स्थितियां उत्पन्न होने पर मिलकर काम करने के बारे में सोचना शुरू कर सकें पर ऐसा संभव नहीं है क्योंकि नेताओं के दिल में केवल राजनैतिक लाभ ही छाये रहते हैं. २६/११ के बाद मनमोहन सिंह ने नेता प्रतिपक्ष आडवाणी को अपने साथ मुंबई के दौरे का आमंत्रण दिया था जिसे भाजपा की अंदरूनी राजनीति के चलते अमली जामा नहीं पहनाया जा सका था वर्ना वह भारतीय राजनीति में एक गैर राजनैतिक पीएम की बड़ी परिवर्तनकारी पहल भी हो सकती थी. 
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