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Friday, 18 September 2015

यूपी में शिक्षा मित्र और कानून

                                                      कोर्ट के आदेश के बाद जिस तरह से यूपी के शिक्षा मित्रों को नियमित किये जाने सम्बन्धी सरकारी आदेश को रद्द किया गया और उसके बाद राजनीति शुरू हो गयी है उससे यही लगता है कि देश में कानून की किसी को भी थोड़ी भी फ़िक्र नहीं है और लगभग सभी दल समाज के इतने बड़े वर्ग को नाराज़ नहीं करना चाह रहे हैं. प्रदेश में जिस तरह से कम शिक्षित लोगों को गांवों के नज़दीक ही शिक्षा मित्रों के तौर पर एक निश्चित मानदेय के माध्यम से तैनाती दी गयी थी वह निश्चित रूप से प्रदेश की जर्जर शिक्षा व्यवस्था के लिए एक सही कदम था पर बाद में जिस तरह से अखिलेश सरकार ने इन लोगों को बिना आवश्यक पात्रता के ही नियमित करने का आदेश जारी किया उससे प्रदेश के उन बेरोज़गार युवकों को बहुत धक्का लगा जो इन लोगों से अधिक शिक्षित और अध्यापन कार्य के लिए विभिन्न तरह के कोर्स भी किये हुए थे जिससे उन्होंने सरकार की इस मनमानी के खिलाफ अपने हितों की रक्षा के लिए कोर्ट में गुहार लगायी और कोर्ट ने इस पूरे मामले को तेज़ी से देखते हुए इस पूरी प्रक्रिया को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया है.
                    इस मामले से एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि हमारे राजनेता अपने वोटबैंक को मज़बूत करने के लिए कुछ भी करने पर आमादा ही रहा करते हैं भले ही उससे समाज पर कितना ही बुरा असर क्यों न पड़े ? स्थानीय स्तर पर चुने गए इन शिक्षा मित्रों की शैक्षिक योग्यता के बारे में सभी को पता ही था फिर कानून में बिना उचित संशोधन और इनकी पूरी ट्रेनिंग कराये बिना इस तरह से नियमित किये जाने को आखिर किस तरह से किस कानून के तहत सही ठहराया जा सकता था ? एक बड़े वोटबैंक को अपने पक्ष में करने के चक्कर में अखिलेश सरकार से यह बड़ी चूक तो हुई है और अब कोर्ट के आदेश के बाद इन्हें नियमित भी नहीं रखा जा सकता है तो फिलहाल कम से कम इनको अपने पुराने शिक्षा मित्र के पदों पर तो सामाजिक और राजनैतिक कारणों से बनाये ही रखने के बारे में ठोस विचार किये जाने की आवश्यकता महसूस की जानी चाहिए. जब तक इस मामले में केंद्रीय शिक्षा कानूनों की पहल पर कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है तब तक सरकार को इनके शिक्षा मित्र के स्तर को बनाने के लिए प्रयासरत होना चाहिए. यह मामला इतना गंभीर है कि प्रभावित शिक्षा मित्र आत्महत्या जैसे कदम तक उठाने लगे हैं जिसको रोकने के प्रयास किये जाने बहुत ही आवश्यक हैं.
                      वैसे तो राजनैतिक तौर पर सपा इसमें उलझ गयी है पर कोर्ट के आदेशों को मानने की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों की समझ में यह नहीं आ रहा है कि आखिर वे किस तरह से इस पर अपनी प्रतिक्रिया दें क्योंकि राजनेताओं की इस तरह की नौटंकी में उलझने वाले लोगों की संख्या में लगातार ही बढ़ोत्तरी होती जा रही है. भाजपा की तरफ से २०१७ में होने वाले विधान सभा चुनावों में इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों को नाराज़ न करने की कोशिश की जा रही है और यह कहा गया है कि कानून के अनुसार जो भी संभव होगा वे प्रदेश सरकार की मदद करेंगें और दिल्ली से भी पूरी मदद दिलवाने की कोशिश करेंगें. शिक्षा मित्रों के इस तरह से कहीं का भी न रहने के बाद इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि आखिर सरकारें कब तक इस तरह की मनमानी करके लोगों के भविष्य से खिलवाड़ करती रहेंगीं क्योंकि पिछली माया सरकार ने भी जिस तरह से पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किया था आज वह भी यूपी में बड़ा मुद्दा बना हुआ है. क्या एक समय यूपी में सबसे बेहतरीन लोगों और उनकी राय से चलने वाले लोगों का सत्ता और कानून के सरकारी जानकारों में कोई दखल नहीं रह गया है जो एक पूरा कानून मंत्रालय होने के बाद भी सरकारें अपने हितों को साधने के लिए हर परंपरा और कानून से खेलने से नहीं चूकती हैं ?  
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