मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 18 November 2015

अखिलेश का देर से चेतना

                                                                  २०१२ के चुनावों में अपनी पूरी ऊर्जा लगाने के बाद यूपी में बसपा के शासन में कुछ लोगों द्वारा पूरी प्रदेश में अपना राज चलाने की कोशिशों से नाराज़ जनता को अखिलेश ने अपनी पार्टी के पक्ष में मोड़ने में सफलता पायी थी उसका श्रेय मुलायम सिंह ने उन्हें ही देते हुए पूरी तरह से इनाम के तौर पर सत्ता की चाभी भी सौंप दी थी. मुलायम सिंह के साथ सदैव ही अच्छे संबंधों के साथ रहने वाले और अक्सर विवादों में रहने वाले कद्दावर मंत्री आज़म ख़ाँ व अन्य सीनियर नेताओं के बारे में मुलायम की तरफ से कोई ठोस निर्णय न ले पाने के चलते ही अखिलेश को इन मंत्रियों की हरकतों से लगातार असहज ही होना पड़ा है फिर भी केवल उपकार में पिता से मिली सत्ता को सँभालने के लिए अखिलेश के हाथ कभी भी उतने खुले हुए नहीं रहे जितने होने चाहिए थे जिसका असर सीधे तौर पर जनता की नाराज़गी के तौर पर दिखाई भी दे रहा है. इन सब बातों की जानकारी मिलने और अगले चुनावों के सामने दिखाई देने के साथ अखिलेश की तरफ से मंत्रिमंडल में बड़ा फेर बदल करने के बाद से ही यह जताने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं कि असल में वे ही प्रदेश के सीएम हैं.
                             पंचायत चुनाव निपटने के बाद जिस तरह से विकास की सत्यता जांचने और जनता से सीधा संवाद करने के लिये अखिलेश ने जिलों का दौरा करने का कार्यक्रम बनाना शुरू किया है उससे यही लगता है कि अब वे इस बात को समझ चुके हैं कि उनकी पार्टी के अराजक लोगों ने भले ही कुछ भी किया हो पर जनता को यह सन्देश देने का समय आ गया है कि अब सीएम की नज़र पूरे प्रदेश पर है. यदि देश की सबसे बड़ी आबादी को अपने में समेटे यूपी जैसे राज्य के सीएम की तरफ से लखनऊ में सत्ता के गलियारों को छोड़कर जिलों शहरों और गांवों का रुख किया जाना तय हो रहा है तो यह देश और प्रदेश के लिए अच्छा ही है क्योंकि इससे जहाँ अधिकारियों को काम की गुणवत्ता को प्रभावित करने की मानसिकता से दूर करने में मदद मिलेगी वहीं जनता को विकास के मद में खर्च किये जाने वाले हर रूपये का लाभ भी मिल सकेगा. पिछले तीन दशकों में सत्ता के चाटुकार अधिकारियों को जिस तरह से मलाईदार पद देने की परंपरा यूपी के सभी सत्ताधारी दलों ने अपनायी थी उसके चलते अब इन अधिकारियों के पास सत्ताधारी दल के जिलाध्यक्ष और विधायकों के साथ कुछ तेज़ तर्रार नेताओं को सँभालने से ही मन माफिक काम करने की छूट मिल जाया करती है अब उसका खुलासा भी खुद सीएम के सामने होने की आशा बलवती हो गयी है.
                        यूपी में भले ही किसी भी दल की सरकार क्यों न हो पर जब तक विकास के मामले में जनता की नज़रों में एक पैमाना स्थापित नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में इस प्रदेश की विशाल जनता की अपेक्षाओं पर चलकर आगे बढ़ने में कोई भी सरकार सफल नहीं होने वाली है. आज राजनैतिक प्रशासन जिस तरह का होना चाहिए संभवतः उसमें हमारे अधिकांश सीएम बने नेता पूरी तरह से फेल साबित होते हैं क्योंकि यूपी में मंत्रियों को जिलों का प्रभारी बनाये जाने की परंपरा लम्बे समय से रही है पर ये मंत्री केवल लखनऊ में ही रहना पसंद करते हैं जिससे उनको इस तरह के अधिकार दिए जाने का कोई मतलब भी नहीं होता है. अच्छा हो कि अखिलेश इस कदम के साथ मेरठ, झाँसी और गोरखपुर में हर महीने के दो-तीन बिताने के बारे में निर्णय करें जिससे उन्हें वहां की वास्तविकता भी समझ में आये और प्रशासन के साथ प्रभारी मंत्रियों पर भी दबाव बन सके. सीएम के लिए प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में आना जाना कोई बड़ी बात नहीं है बस अब उनको इस तरह के निर्णय लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता भर है तो यूपी में उनको अपनी छवि चमकाने के साथ कुछ ठोस करने का अवसर भी मिल सकता है.   
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