मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 2 March 2014

१८५७ और अजनाला के शहीद सैनिक

                                           मेरठ से उठी आज़ादी की पहली चिंगारी ने जिस तरह सूचनाओं के अभाव में भी अग्रेज़ों को हिलाकर रख दिया था और उसे कुचलने के लिए जिस बर्बरता से अंग्रेज़ों ने आम लोगों और सैनिकों का खुले आम क़त्ल किया उसकी मिसालें मिलने के क्रम में अमृतसर के अजनाला में "शहीदां दा खूह" यानि "शहीदों के कुंएं" से उन वीर सैनिकों के कंकाल बरामद होने के बाद यादें ताज़ा सी होती लगती हैं. लाहौर की मियाँमीर छावनी में तैनात बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की २६ वीं रेजिमेंट की लगभग ५०० सैनिकों ने विद्रोह में शामिल होकर अमृतसर की तरफ कूच कर दिया था जिसे रोकने के लिए अमृतसर के डीसी हेनरी कूपर ने रावी नदी के तट पर २१८ सैनिकों की गोली मारकर हत्या कर दी थी और शेष बचे २८२ सैनिकों को गिरफ्तार कर अजनाला ले जाया गया था अगली सुबह २३७ सैनिकों को मारकर और ४५ को ज़िदा ही कुंएं में फेंककर मिट्टी भर दी गयी थी और विद्रोह को दबा दिया गया था. गुरुद्वारा शहीदगंज की विशेष कमिटी ने जिस तरह से इन सैनिकों के कंकालों को सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार करने का काम शुरू किया है वह अपने आप में अनूठा और सराहनीय ही है.
                                         इस तरह से आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी शहीदों को यदि पूरा सम्मान नहीं दिया जा सका है तो इसके लिए आखिर कौन ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है ? निश्चित तौर पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काफी लम्बे चले इतिहास में कई पीढ़ियों का योगदान रहा है और उस समय देश पर अंग्रेज़ों का शासन होने के कारण आम लोगों तो पूरे भारत में किसी भी सही तथ्य तक नहीं पहुँच पाते थे और आज भी देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेकों अनामित वीरों के बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है तथा इसके बारे में पुरानी बात होने के चलते किसी भी राज्य या केंद्र सरकार का ध्यान भी इस तरफ कभी भी नहीं गया है. इसके लिए एक काम तो अब अवश्य ही किया जाना चाहिए कि देश के सभी ज़िलों के पुराने गजट जहाँ तक सम्भव हो सकें एक बार इतिहासकारों की मदद से फिर से पलटे जाएँ और उन अनामित लोगों के बारे में जो कुछ भी वहाँ पर मिल सके उस पर आज के अनुसार खोज की जाये और उन शहीदों की यादों में कम से कम उनके जन्मस्थल या कार्य स्थल में उनके नाम से कुछ किया जा सके.
                                        भारत सरकार को आज़ादी के ७५ वर्ष मनाने के लिए एक समिति का गठन अभी से ही करना चाहिए जिसमें इन अनगिनत अनाम लोगों के बारे में अभी से सूचनाएँ एकत्रित करने का काम शुरू किया जा सके और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से भी इस मामले में पूरे सहयोग को माँगा जाये जिससे बंटवारे के बाद वहाँ के अभिलेखों में यदि कुछ आज़ादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ कुछ और मिल सके तो उसको पूरे सम्मान के साथ दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए. अजनाला के इन अनामित शहीदों के लिए आज हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि इनको मरणोपरांत यथोचित सम्मान दिया जाये जिसके लिए शहीदगंज गुरुद्वारा प्रशंसनीय ढंग से काम करने में लगा ही हुआ है. यदि सम्भव हो सके तो इनकी इन्फैंट्री के इतिहास को भी फिर से देखा जाये और इन सभी ५०० सैनिकों के नाम और पते खोजकर उनके जन्म स्थल पर उनके सम्मान में कम से कम एक स्मारक तो बनाया ही जाये. यदि कुछ अधिक सम्भव न हो सके तो इनके जन्मस्थल के सरकारी शिक्षण संस्थानों का नाम तो इनके नाम पर कर ही दिया जिससे इनका नाम भी भारतीय समाज में ज़िंदा रह सके और इन शहीदों को सही श्रद्धांजलि भी दी जा सके.         
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