मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 22 September 2015

सोशल मीडिया पर बे-लगाम लगाम ?

                                                   राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार द्वारा जिस तरह से नयी नेशनल इंक्रिप्शन पालिसी के लिए मसौदा जारी किया गया है वह निश्चित रूप से देश में डिजिटल इंडिया का सपना देखने वाले पीएम और सरकार की मंशा के अनुरूप कहीं से भी नहीं लगता है क्योंकि इसमें सरकार की तरफ से उपयोगकर्ताओं के लिए व्हाट्सएप, वाइबर, गूगल और अन्य सन्देश सेवाओं पर निगरानी करने के लिए यह कहा जा रहा है कि सभी 'बी' और 'सी' श्रेणी के उपयोगकर्ताओं को ९० दिन तक अपने संदेशों को सुरखित रखना होगा. प्रस्तावित कानून में इस तरह की बातें शामिल किये जाने से जहाँ इन सेवाओं का उपयोग करने वाले लोगों के लिए बहुत समस्या बढ़ने वाली है वहीं सरकार के लिए भी यह बड़े विरोध का कारण भी बन सकती है. आज जब सूचना क्रांति का युग चल रहा है तो उसके बीच ही सरकार के द्वारा इस तरह के प्रस्ताव करना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है यह तो समय ही बताएगा पर इससे देश की उस कमज़ोरी को सामने लाने में पूरी मदद मिलने वाली है जो हम सब को दिखाई नहीं देती है.
                      आज जो भी मेसेजिंग एप्लीकेशन उपयोग में लाये जा रहे हैं उनका बड़े पैमाने पर उपयोग और दुरूपयोग भी हो रहा है जिससे सरकार के लिए समय समय पर आंतरिक कानून व्यवस्था बनाये रखने के साथ विदेशी आतंकियों के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों पर नज़र रखना मुश्किल होता जा रहा है और यह प्रयास उसी क्रम में किये जा रहे हैं. संभवतः सरकार ने इन ऍप्लिकेशन्स की लोकप्रियता पर ध्यान नहीं दिया है क्योंकि आज अधिकतर स्मार्ट फ़ोन के साथ बहुत सारे फीचर फ़ोन्स में भी इनका समावेश किया जाने लगा है और अभी भी सरकार को यही लगता है कि इससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है तो यह उसकी पुरातन सोच ही कही जा सकती है. देश में नई दिल्ली समेत बहुत जगहों पर आज केंद्र और राज्य सरकार के प्रयासों के बाद पुलिस विभाग में सोशल मीडिया लैब्स स्थापित कर समाज विरोधी संदेशों पर नज़र रखने का काम शुरू किया जा चुका है जिसके काफी सकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं पर इस तरह के प्रयासों के बाद भी सरकार पता नहीं क्यों आम लोगों पर इस तरह से नज़र रखने की मंशा रखती है.
                    कानूनी तौर पर यह प्रावधान निजता का खुला उल्लंघन करने वाले साबित हो सकते हैं क्योंकि इससे हर व्यक्ति के सेव किये गए संदेशों के गलत हाथों में जाने की संभावनाएं भी बहुत बढ़ने वाली हैं. इन ऍप्लिकेशन्स की लोकप्रियता सिर्फ इसलिए ही अधिक है क्योंकि इनमें बिना किसी दबाव के आसानी से ही दुनिया के किसी भी हिस्से से संपर्क साधा जा सकता है पर इन पर इस तरह से अघोषित बैन लगाने की कोई भी कोशिश समाज में हलचल तो पैदा ही करने वाली है. इसकी 'सी' श्रेणी में जिस तरह से आम जनता को रखा गया है और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे ९० दिन का रिकॉर्ड स्वयं ही रखें तो क्या जनता के पास इतनी क़ाबलियत और समय है कि वह इस तरह से हर सन्देश को सुरक्षित रख सके ? अधिकांश लोग तो आज तक यह भी नहीं जानते होंगें कि इंटरनेट से जुड़े हुए मुद्दों से निपटने के लिए देश में कोई सायबर कानून भी मौजूद है तो क्या इस तरह के नए कानून से लोगों के लिए कानून के शिकंजे में उलझना और भी आसान नहीं होने वाला है ? सरकार को इन संदेशों को पढ़ने की क्षमता विकसित करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि आज दुनिया भर में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का बोलबाला है फिर भी हम उस क्षमता का उपयोग करने के स्थान पर लोगों की निजता में खलल डालने के प्रयास को आसान मानते हैं.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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